Punjab Kesari 2021-09-08

तालिबान का परोक्ष समर्थन है "हिंदूफोबिया"

ऐसा प्रतीत होता है कि विश्व में "हिंदूफोबिया" चरम पर पहुंच गया है। शायद इसका कारण हालिया वर्षों के उस घटनाक्रम में छिपा है, जिसमें भारत की वर्तमान मोदी सरकार के नेतृत्व में सीमा पर चीन के अतिक्रमण, कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद, भारत-विरोधी शक्तियों और देश को भीतर से कमजोर (विकास में बाधा डालने सहित) करने वाले विदेशी वित्तपोषित एनजीओ पर लगाम कसी जा रही है। "हिंदूफोबिया" और भारत से घृणा अब पर्यायवाची बन चुके है। कोविड-19 विषाणु को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टिंग और लगभग 50 अमेरिकी विश्वविद्यालयों में 10-12 सितंबर को आयोजित होने वाले तीन दिवसीय विकृत "डिस्मैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व" सम्मेलन- इसका प्रमाण है। पाठकों को स्मरण होगा कि कोरोना की दूसरी लहर में जब भारत में प्रतिदिन 2-4 लाख संक्रमण और 3-4 हजार मौत के मामले सामने आ रहे थे, तब कैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भ्रामक तथ्यों, मरीजों की काल्पनिक संख्या, अस्पतालों में ऑक्सीजन-दवाओं-वैक्सीन की कमी, शमशान-घाट में जलती चिताओं और रोते-बिलखते परिजनों की तस्वीरों को विनाश/प्रलय की संज्ञा देकर इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों, चुनावी रैलियों और कुंभ मेले को जिम्मेदार ठहराया था। इस पृष्ठभूमि में विश्व में कोरोना की वर्तमान स्थिति क्या है? विगत कुछ दिनों से अमेरिका, जिसकी आबादी 33 करोड़ है और जो स्वयं को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक-सामरिक शक्ति कहता है- वहां प्रतिदिन औसतन डेढ़ लाख या अधिक कोविड-19 के मामले (संक्रमित और मौत सहित) सामने आ रहे है। परिणामस्वरूप, वहां अस्पतालों में संक्रमित मरीजों की संख्या न केवल बढ़ गई, साथ ही बिस्तर और ऑक्सीजन की किल्लत संबंधित शिकायतें भी आने लगी। विश्व के किसी देश में सर्वाधिक मामले अमेरिका में 4 करोड़ से अधिक मामले सामने आए है, तो सबसे अधिक 6.5 लाख संक्रमितों की मौत भी यही हुई है। इस पृष्ठभूमि में जिस अमेरिकी और पश्चिमी मीडिया ने दुर्भावना से प्रेरित होकर भारत में कोरोना प्रलय की भविष्यवाणी की थी, वह भारत में रिकॉर्डतोड़ टीकाकरण और अमेरिका की कोविड-19 से बिगड़ी स्थिति पर सुविधाजनक चुप्पी साधे बैठा है। क्यों?
Punjab Kesari 2021-09-01

यदि मुगल राष्ट्रनिर्माता है, तो अंग्रेज क्यों नहीं?

हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकार मनोज मुंतशिर और फिल्मकार कबीर खान सार्वजनिक विमर्श में है। जहां कबीर ने मुगलों को भारत का वास्तविक राष्ट्रनिर्माता बताया है, तो मनोज ने उन्हें लुटेरा, आततायी, मंदिर-विध्वंसक और हिंदुओं-सिखों पर अत्याचार करने वाला। जैसे ही लगभग एक ही समय कबीर और मनोज के विचार सामने आए, तब स्वाभाविक रूप से सोशल मीडिया पर हजारों लोग पक्ष-विपक्ष में उतर आए। मैं व्यक्तिगत रूप से इन दोनों हस्तियों से परिचित नहीं हूं। किंतु कबीर का प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन और मनोज का मुखर विरोध करने वाले समूह और उनकी मानसिकता से अवगत हूं। यह कोई संयोग नहीं कि इन लोगों में अधिकांश वही चेहरे है, जो श्रीराम को काल्पनिक बता चुके है- अयोध्या मामले में रामलला के पक्ष में निर्णय आने पर सर्वोच्च न्यायालय को कटघरे में खड़ा कर चुके है- धारा 370-35ए के संवैधानिक क्षरण सहित नागरिक संशोधन अधिनियम को मुस्लिम विरोधी बता कर चुके है और बीते सात वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वैचारिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत घृणा के कारण शेष विश्व में भारत की शाश्वत सहिष्णु छवि को कलंकित कर रहे है। मनोज मुंतशिर का "हम किसके वशंज" नामक वीडियो वायरल हुआ। उसमें वे कहते हैं, "शासक के रूप में मुगलों का कार्यकाल इतिहास में सबसे अच्छा कैसे होगा, जब हजारों हिंदुओं को इस्लाम में परिवर्तित नहीं करने के लिए मार दिया गया था। अगर उनका कार्यकाल सबसे अच्छा था, तो रामराज्य क्या था? हमारे घर तक आने वाली सड़कों के नाम भी किसी अकबर, हुमायूं, जहांगीर जैसे ग्लोरिफाइड डकैत के नाम पर रख दिए गए। हम इस हद तक ब्रेनवाश्ड हो गए कि अचानक हमारे प्री-प्राइमरी टेक्स्ट बुक में ग से गणेश हटाकर ग से गधा लिख दिया गया और हमारे माथे पर बल तक नहीं पड़ा..."

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