Punjab Kesari 2021-08-04

विपक्षी एकता या यथास्थितिवादियों की कुंठा?

गत कई दिनों से अधिकांश विपक्षी दल पेगासस जासूसी मुद्दे को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद है। प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस संबंध में जहां एक जांच समिति का गठन कर दिया है, वही अन्य विरोधी दल- कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी के नेतृत्व मं, संसद के मॉनसून सत्र को बाधित कर रहे है। इस प्रकार की सरकार विरोधी जुगलबंदी नई बात नहीं है। वर्ष 2014 के बाद कभी लोकतंत्र, संविधान, न्यायिक प्रणाली, ईवीएम, असहिष्णुता, संघीय ढांचा और तो अब "निजता पर हमले" के नाम पर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करके विश्व के सबसे बड़े भारतीय लोकतंत्र को कलंकित किया जा रहा है। आखिर पिछले 88 महीनों में ऐसा क्या-क्या हुआ है, जिससे अधिकांश विपक्षी दल हतप्रभ है? इसका उत्तर जानने से पहले पेगासस संबंधित कालक्रम और इसकी जड़ों को खोजना आवश्यक है। पेगासस संबंधित रिपोर्ट को "एमनेस्टी इंटरनेशनल", "फॉरबिडन स्टोरीज" और "सिटीजन लैब" आदि नामक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर तैयार की है। कई विस्तृत रिपोर्टों से स्पष्ट हो चुका है कि पेगासस संबंधित खुलासे में तथ्य कम, पूर्वाग्रह और भ्रम की भरमार अधिक है। उदाहरणस्वरूप, 750 करोड़ से अधिक आबादी वाले विश्व में 67 में से मात्र 23 मोबाइल फोन में जासूसी हेतु मिले इजराइल निर्मित तथाकथित पेगासस सॉफ्टवेयर को आधार बनाकर दावा किया जा रहा है कि दुनियाभर (भारत सहित) में 50 हज़ार लोगों की जासूसी की गई है। यह आंकड़ा कहां से आया? इससे बढ़कर जिन 23 मोबाइलों में यह सॉफ्टवेयर मिलने का दावा किया गया है, वह कौन है- इसका मूल रिपोर्ट में कहीं भी कोई उल्लेख नहीं है। क्यों?
Dainik Jagran 2021-06-22

कौन है भारत में

घोर घृणाग्रस्त और अंधा-लालच या फिर इन दोनों दुर्गुणों से युक्त व्यक्ति या समूह- समाज को कितने भयंकर संकट में डाल सकता है, इसकी बानगी हमें कोविड-19 के दौर में देखने को मिल रही है। इस विकृत कड़ी में नवीनतम प्रयास कांग्रेस में सोशल मीडिया और डिजिटल संचार के राष्ट्रीय समन्वयक गौरव पांधी ने हाल ही में किया है। उन्होंने कोवैक्सीन में "गाय के नवजात बछड़े का सीरम" होने का दावा किया था। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि पांधी या फिर उनकी पार्टी की गोवंश के प्रति कोई श्रद्धा है। यहां गौरव का उद्देश्य केवल लोगों को वैक्सीन के प्रति पुन: हतोत्साहित करना है। स्मरण रहे कि 2017 में केरल की सड़क पर कांग्रेस के नेताओं ने दिनदहाड़े सरेआम गाय के बछड़े की हत्या और उसके मांस का सेवन करके "सेकुलरवाद" में अपनी आस्था का प्रमाण दिया था। वैश्विक महामारी के खिलाफ भारत विगत वर्ष से संघर्षरत है। किंतु विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से घृणा करने वालों का कुनबा- इस युद्ध में भारत का पक्ष कमजोर कर रहा है। इस षड़यंत्र के एक छोर पर जहां सांप्रदायिक मानस से प्रेरित उत्तरप्रदेश की कनिष्ठ स्वास्थ्य कर्मचारी निहा खान है, तो दूसरी ओर प्रभावशाली स्थानों पर आसीन स्वघोषित सेकुलरवादियों की जमात- दुष्प्रचार और कुतर्क के आधार पर कोविड विषाणु के साथ खड़ी है। इस कुनबे को "कोरोना बंधु" की संज्ञा से भी परिभाषित किया जा सकता है।
Punjab Kesari 2021-04-14

भारत विरोधी शक्तियों के नए हथियार

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चरम पर पहुंच चुका है। कांग्रेस, तृणमूल सहित कई स्वघोषित सेकुलरिस्ट अपने प्रचार में पुन: "लोकतंत्र-संविधान खतरे में है" जैसे जुमलों का उपयोग करके सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा कर रहे है। इस बार इन दलों ने इसके लिए उन विदेशी संगठनों की रिपोर्ट को आधार बनाया है, जिसमें भारत के लोकतांत्रिक स्वरूप के तथाकथित रूप से क्षीण होने और देश में निरंकुशता बढ़ने की बात कही गई है। इन्हीं संगठनों में से एक "फ्रीडम हाउस", तो दूसरी "वी-डैम" है। यह निर्विवाद सत्य है कि हमारा देश 800 वर्षों के परतंत्र कालखंड के बाद स्वयं को उभारने हेतु प्रयासरत है और इस दिशा में ऐतिहासिक भूलों को सुधारते हुए अभी बहुत कुछ करना शेष है। हाल के वर्षों में भारत में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन को शेष विश्व अनुभव भी कर रहा है। स्वदेशी कोविड-19 टीका संबंधी भारत का "वैक्सीन मैत्री अभियान"- इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक अकाट्य सत्य यह भी है कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान के कारण हजारों वर्षों से पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक बना हुआ है। वह ऐसा केवल भारतीय संविधान में "सेकुलर" शब्द जोड़ने या अन्य किसी प्रावधान के कारण नहीं है- क्योंकि यदि ऐसा होता, तो देश का "सेकुलर" संविधान इस्लामी चरित्र वाले घाटी में कश्मीरी पंडितों को जिहाद की खुराक बनने से बचा लेता। किंतु ऐसा हुआ नहीं। सच तो यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में खंडित भारत का हिंदू चरित्र ही इस भूखंड के लोकतांत्रिक और पंथनिरपेक्षी होने की एकमात्र गारंटी है।
Punjab Kesari 2021-03-31

दलित मुस्लिम गठजोड़ कितना स्वाभाविक?

दिल्ली स्थित सराय काले खां घटनाक्रम से स्वयंभू सेकुलरवादी, वामपंथी-जिहादी और उदारवादी-प्रगतिशील कुनबा अवाक है। इसके तीन कारण है। पहला- पूरा मामला देश के किसी पिछड़े क्षेत्र में ना होकर राजधानी दिल्ली के दलित-बसती से संबंधित है। दूसरा- इस कृत्य को प्रेरित करने वाली मानसिकता के केंद्रबिंदु में घृणा है। और तीसरा- पीड़ित वर्ग दलित है, तो आरोपी मुस्लिम समाज से संबंध रखता है। "जय भीम-जय मीम" का नारा बुलंद करने वालों और दलित-मुस्लिम गठबंधन के पैरोकारों के लिए इस घटनाक्रम में तथ्यों को अपने विकृत नैरेटिव के अनुरूप तोड़ना-मरोड़ना कठिन है। मामला सराय काले खां से सटे दलित बस्ती में 22 वर्षीय हिंदू युवक के 19 वर्षीय मुस्लिम युवती से प्रेम-विवाह से जुड़ा है। सोशल मीडिया में वायरल तस्वीरों और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सुमित नामक युवक ने 17 मार्च को एक मंदिर में हिंदू वैदिक संस्कार और रीति-रिवाज के साथ अपनी प्रेमिका खुशी से विवाह किया था। उसी मंदिर में मुस्लिम युवती ने अपनी इच्छा से मतांतरण भी किया। इस संबंध में युवती ने थाने जाकर सहमति से शादी करने संबंधी बयान भी दर्ज करवाया था। इन सबसे नाराज मुस्लिम लड़की के परिजनों और उनके साथियों ने 20 मार्च (शनिवार) रात दलित बस्ती में घुसकर जमकर उत्पात मचाया और दोनों को जान से मारने की धमकी दी। देर रात 20-25 युवकों की मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं की कुल तीन गलियों को निशाना बनाकर तलवार लाठी डंडे और पत्थरों के साथ हमला कर दिया। आरोपी पक्ष पर आरोप है कि वे "खून की होली" खेलने जैसी धमकियां दे रहे थे। दिल्ली पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करके युवती के भाई सहित चार युवकों को गिरफ्तार किया है। आलेख लिखे जाने तक, क्षेत्र में फिलहाल शांति है और अर्धसैनिक बल तैनात हैं। पीड़ित प्रेमी-युगल ने एक वीडियो जारी करके स्थानीय प्रशासन से सुरक्षा मांगी है, तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने पुलिस से 6 अप्रैल तक रिपोर्ट।
Punjab Kesari 2021-03-10

कांग्रेस ब्रांड सेकुलरवाद

भारत में "सेकुलरवाद" कितना विकृत हो चुका है- इसे आगामी विधानसभा चुनावों ने फिर रेखांकित कर दिया। कांग्रेस ने भाजपा के विजय-उपक्रम को रोकने हेतु कुछ तथाकथित "सेकुलर" राजनीतिक दलों से चुनावी समझौता किया है। प.बंगाल में जहां उसने वामपंथियों के साथ हुगली स्थित फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की "इंडियन सेकुलर फ्रंट" (आई.एस.एफ.) से गठबंधन किया है, वही असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की "ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट" (ए.आई.यू.डी.एफ.) के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। इन दोनों मजहबी राजनीतिक दलों का परिचय उनके राजनीतिक दृष्टिकोण, जोकि शरीयत और मुस्लिम हित तक सीमित है- उससे स्पष्ट है। यह पहली बार नहीं है, जब देश में सेकुलरवाद के नाम पर इस्लामी कट्टरता और संबंधित मजहबी मान्यताओं को पोषित किया जा रहा है। कटु सत्य तो यह है कि स्वतंत्रता से पहले और बाद में, सेकुलरिज्म की आड़ में जहां मुस्लिमों को इस्लाम के नाम पर एकजुट किया जा रहा है, वही हिंदू समाज को जातिगत राजनीति से विभाजित करने का प्रयास हो रहा है। इस विकृति का न केवल बीजारोपण, अपितु उसे प्रोत्साहित करने में कांग्रेस ने महती भूमिका निभाई है। कांग्रेस की इस्लामी कट्टरवादियों से गलबहियां नई नहीं है। केरल में 1976 से कांग्रेस नीत यूनाइनेड डेमोक्रेटिक फ्रंट में "इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग" (आई.यू.एम.एल.) सहयोगी बनी हुई है। यह दल उसी मुस्लिम लीग का अवशेष है, जिसने "काफिर-कुफ्र" की अवधारणा से प्रेरित होकर और हिंदुओं के साथ सत्ता साझा करने से इंकार करते हुए 1947 में देश का रक्तरंजित विभाजन कराया था।
Punjab Kesari 2021-02-10

आंदोलनजीवियों का सच

दिल्ली सीमा पर कृषि-सुधार कानून विरोधी आंदोलन को ढाई माह से ऊपर हो गया है। यह कब समाप्त होगा- कहना कठिन है। किंतु इस आंदोलन में कुछ सच्चाइयां छिपी है, जिससे हमें वास्तविक स्थिति को समझने में सहायता मिलती है। पहला- यह किसान आंदोलन ही है। दूसरा- कृषि सुधारों के खिलाफ आंदोलित यह किसान देश के कुल 14.5 करोड़ किसानों में से मात्र 4-5 लाख का प्रतिनिधित्व करते है। तीसरा- यह संघर्ष नव-धनाढ्य किसानों के वित्तीय हितों और अस्तित्व की रक्षा को लेकर है। और चौथा- इस विरोध प्रदर्शन का लाभ हालिया चुनावों (2019 का लोकसभा चुनाव सहित) में पराजित विपक्षी दलों के समर्थन से जिहादी, खालिस्तानी, वामपंथी, वंशवादी और प्रतिबंधित एनजीओ और शहरी नक्सली जैसे प्रमाणित भारत विरोधी अपने-अपने एजेंडे की पूर्ति हेतु उठा रहे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए व्यंग-विनोद में "आंदोलनजीवी" शब्दावली का उल्लेख किया था। वास्तव में, यह लोग अलग-अलग रूपों में भारत की मूल सनातन और बहुलतावादी भावना के खिलाफ दशकों से प्रपंच रच रहे है। चूंकि अपनी विभाजनकारी मानसिकता और भारत-विरोधी चरित्र के कारण यह समूह अपने बल पर भारत में कोई भी आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ है, इसलिए वे दशकों से- विशेषकर वर्ष 2014 के बाद से देश में सत्ता-अधिष्ठान विरोधी प्रदर्शनों (वर्तमान किसान आंदोलन सहित) में शामिल होकर खंडित भारत को फिर से टुकड़ों में विभाजित करने का प्रयास कर रहे है। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में उपद्रव, लालकिले के प्राचीर में जबरन घुसकर पंथविशेष का ध्वज फहराना और खालिस्तान समर्थकों द्वारा विदेशों में प्रदर्शन के बाद एक विषाक्त "टूलकिट" का खुलासा होना, जिसमें योजनाबद्ध तरीके से किसान आंदोलन को लेकर भारत-विरोधी अभियान छेड़ने का उल्लेख है- इसका प्रमाण है।

Outlook India 2011-10-03

Outlook India

By Mr. Balbir Punj
Outlook India 2007-10-01

Outlook India

By Mr. Balbir Punj




12345678910111213141516171819202122232425262728293031323334353637383940414243444546474849505152535455565758596061626364656667Next