Amar Ujala 2021-09-16

ए.एम.यू.- नेहरू आज भी प्रासंगिक

उत्तरप्रदेश स्थित अलीगढ़ बीते दिनों सुर्खियों में रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 सितंबर को यहां 92 एकड़ भूभाग में बन रहे राजा महेंद्र प्रताप सिंह राज्य विश्वविद्यालय का शिलान्यास करने पहुंचे थे। यह क्षेत्र ताले और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए.एम.यू.) के कारण पहले से प्रसिद्ध है। वास्तव में, इस संस्थान का अब भी जीवंत होना- सूचक है कि भारत कितना सहिष्णु है। सभ्य राष्ट्र उच्च शिक्षा हेतु विश्वविद्यालयों का निर्माण करते है। किंतु ए.एम.यू. विश्व का एकमात्र अपवाद है, जिसने नए देश- पाकिस्तान के जन्म की रूपरेखा तैयार की। भारत का रक्तरंजित विभाजन करवाने में महती भूमिका निभाने के बाद भी, यह संस्थान अपनी अपरिवर्तित सांप्रदायिक मनोवृति सहित केंद्रीय अनुदान की अनुकंपा पर देश में अब भी विद्यमान है। वर्तमान ए.एम.यू. की जड़े लगभग डेढ़ शताब्दी पुरानी है। 1875 तक यह एक स्कूल और 1877 में मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज के रूप में विख्यात था। ब्रितानी एजेंट सर सैयद अहमद खां द्वारा स्थापित इस शैक्षणिक संस्था का मूल उद्देश्य मुसलमानों को अंग्रेजों का विश्वासी बनाना और उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन से काटना था। इसका खाका सैयद ने "असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिंद" लिखकर तैयार किया, जिसमें उन्होंने यह स्थापित करने का प्रयास किया कि 1857 की क्रांति में मुसलमानों की कोई भूमिका नहीं थी, जोकि सत्य से परे है। इस संघर्ष में हिंदुओं और मुसलमानों ने कंधे से कंधा मिलकर अंग्रेजों को चुनौती दी थी। सैयद ने मजहबी कारणों से अधिकांश मुस्लिमों को राष्ट्रीय आंदोलन से दूर कर दिया, जिसका सूत्रपात उन्होंने मेरठ में 16 मार्च 1888 को भाषण देकर किया। यहां सैयद ने "दो राष्ट्र सिद्धांत" का औपचारिक शिलान्यास करते हुए कहा, "...मान लीजिए, अंग्रेज अपनी सेना, तोपें, हथियार और बाकी सब लेकर देश छोड़कर चले गए, तो देश का शासक कौन होगा? उस स्थिति में क्या यह संभव है कि हिंदू और मुस्लिम कौमें एक ही सिंहासन पर बैठें? निश्चित ही नहीं... तब हमारे पठान बंधू टिड्डों की झुंड की तरह पर्वतों और पहाड़ों से निकलकर बाहर आएंगे और बंगाल तक खून की नदियां बहा देंगे... आपको पता है शासन कैसे किया जाता है, आपने तो 700 साल भारत पर राज किया है...।"
Punjab Kesari 2021-09-01

यदि मुगल राष्ट्रनिर्माता है, तो अंग्रेज क्यों नहीं?

हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध गीतकार मनोज मुंतशिर और फिल्मकार कबीर खान सार्वजनिक विमर्श में है। जहां कबीर ने मुगलों को भारत का वास्तविक राष्ट्रनिर्माता बताया है, तो मनोज ने उन्हें लुटेरा, आततायी, मंदिर-विध्वंसक और हिंदुओं-सिखों पर अत्याचार करने वाला। जैसे ही लगभग एक ही समय कबीर और मनोज के विचार सामने आए, तब स्वाभाविक रूप से सोशल मीडिया पर हजारों लोग पक्ष-विपक्ष में उतर आए। मैं व्यक्तिगत रूप से इन दोनों हस्तियों से परिचित नहीं हूं। किंतु कबीर का प्रत्यक्ष-परोक्ष समर्थन और मनोज का मुखर विरोध करने वाले समूह और उनकी मानसिकता से अवगत हूं। यह कोई संयोग नहीं कि इन लोगों में अधिकांश वही चेहरे है, जो श्रीराम को काल्पनिक बता चुके है- अयोध्या मामले में रामलला के पक्ष में निर्णय आने पर सर्वोच्च न्यायालय को कटघरे में खड़ा कर चुके है- धारा 370-35ए के संवैधानिक क्षरण सहित नागरिक संशोधन अधिनियम को मुस्लिम विरोधी बता कर चुके है और बीते सात वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वैचारिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत घृणा के कारण शेष विश्व में भारत की शाश्वत सहिष्णु छवि को कलंकित कर रहे है। मनोज मुंतशिर का "हम किसके वशंज" नामक वीडियो वायरल हुआ। उसमें वे कहते हैं, "शासक के रूप में मुगलों का कार्यकाल इतिहास में सबसे अच्छा कैसे होगा, जब हजारों हिंदुओं को इस्लाम में परिवर्तित नहीं करने के लिए मार दिया गया था। अगर उनका कार्यकाल सबसे अच्छा था, तो रामराज्य क्या था? हमारे घर तक आने वाली सड़कों के नाम भी किसी अकबर, हुमायूं, जहांगीर जैसे ग्लोरिफाइड डकैत के नाम पर रख दिए गए। हम इस हद तक ब्रेनवाश्ड हो गए कि अचानक हमारे प्री-प्राइमरी टेक्स्ट बुक में ग से गणेश हटाकर ग से गधा लिख दिया गया और हमारे माथे पर बल तक नहीं पड़ा..."
Punjab Kesari 2021-06-30

कश्मीरी हिंदुओं का पलायन: दोषी कौन?

विगत गुरुवार (24 जून) जम्मू-कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देश के 14 नेताओं के साथ बैठक हुई। तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आज़ाद ने अन्य विषयों के साथ, घाटी में कश्मीरी पंडितों के पुर्नवास की मांग भी रखी। क्या यह सत्य नहीं कि तीन दशक पहले जिस कुत्सित मानसिकता ने लगभग पांच लाख कश्मीरी पंडितों को पलायन हेतु विवश किया, वह मजहबी घृणा से प्रेरित जिहाद था और घाटी में व्याप्त इको-सिस्टम दशकों से उसी चिंतन से जनित है? क्या उसी दर्शन को घाटी में पुष्ट करने या फिर उसपर अपनी आंख मूंदे रहने के लिए यही 14 नेता किसी न किसी रूप में जिम्मेदार नहीं? क्या यह सत्य नहीं कि जब कश्मीरी पंडित जघन्य अपराध के शिकार हो रहे थे और कालांतर में न्याय की मांग कर रहे थे, तब इन्हीं नेताओं में से कोई न कोई प्रदेश के जिम्मेदार पद पर थे? कश्मीरी पंडितों की निर्मम हत्या, उनकी महिलाओं से बलात्कार, उनकी पैतृक संपत्ति पर कब्जा करने वाले हजारों में से शायद ही किसी को सजा हुई है। यह ठीक है कि इन मामलों में दर्ज कुछ प्राथमिकियों में आरोपियों के नाम थे और जांच का नाटक भी हुआ, किंतु अधिकांश जमानत पर बाहर है। क्या इस अन्याय के लिए यही 14 नेता जिम्मेदार नहीं, जोकि अलग-अलग समय पर प्रदेश की सत्ता में रहे? कश्मीरी पंडितों के खिलाफ "काफिर-कुफ्र" जनित जिहाद की शुरूआत 14 सितंबर 1989 को हुई थी। तब श्रीनगर स्थित हब्बाकदल में प्रतिष्ठित अधिवक्ता, समाजसेवी और जनसंघ/भाजपा के बड़े नेता पंडित टीकालाल टपलू की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। उसी वर्ष चार नवंबर को आतंकियों ने सेवानिवृत न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की श्रीनगर में व्यस्तम हरिसिंह मार्ग पर सरेआम गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। वे कश्मीरी पंडितों के सबसे मुखर चेहरों में से एक थे।
Punjab Kesari 2021-01-06

हम में से कुछ को अपनी पहचान से घृणा क्यों?

गत बुधवार (30 दिसंबर) को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में बहुसंख्यक मुसलमानों की भीड़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं के एक प्राचीन मंदिर को ध्वस्त करके जला दिया। इस प्रकार के जमींदोज का यह भारतीय उपमहाद्वीप में कोई पहला मामला नहीं था और यह आखिरी बार था- ऐसा भी कहा नहीं जा सकता। विश्व के इस भूखंड में देवालय विध्वंस की परंपरा सन् 712 में मो.बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के साथ शुरू हुई थी- जो गजनी, गौरी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब और टीपू सुल्तान जैसे क्रूर इस्लामी आक्रांताओं के कालखंड से आजतक अविरत जारी है। जब पाकिस्तान के खैबर में जिहादियों द्वारा प्राचीन हिंदू मंदिर को तोड़ा जा रहा था, तब लगभग उसी समय में भारत के आंध्रप्रदेश में कई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां को खंडित कर दिया गया। पहले विजयनगर में भगवान राम की 400 वर्ष पुरानी मूर्ति क्षत-विक्षत किया गया, फिर राजमुंद्री में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी और विजयवाड़ा में देवी सीता की प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त मिली। अब खैबर पख्तूनख्वा और आंध्रप्रदेश की घटनाओं में अंतर केवल इतना था कि पाकिस्तान में यह सब घोषणा करके खुलेआम हुआ, तो यहां चोरी-छिपे या रात के अंधेरे में किया गया। यह अकाट्य है कि इन दोनों घटनाओं को मूर्त रूप में देने वाली मानसिकता एक ही है। यदि 1947 के बाद पाकिस्तान का हिंदू, बौद्ध, जैन मंदिरों और प्रतिमाओं के विध्वंस का रिकॉर्ड है, तो खंडित भारत में "काफिर-कुफ्र" दर्शन से प्रेरित मजहबी हिंसा का लंबा इतिहास है। वर्ष 1989-91 के बीच जब कश्मीर जिहादी तूफान की चपेट में था, जिसमें दर्जनों हिंदुओं की हत्या और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार के बाद पांच लाख कश्मीर पंडित पलायन हेतु विवश हुए थे- तब उसी विषाक्त वातावरण में कई ऐतिहासिक मंदिरों को या तो बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया था या फिर पूर्ण रूप से खंडित। 2012 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर के 208 मंदिर जिहाद का शिकार हुए थे।

दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा क्यों भड़की?

देश की राजधानी दिल्ली का उत्तर-पूर्वी हिस्सा 23 फरवरी की रात से अगले 48 घंटों तक हिंसा की आग में जलता रहा। इसकी लपटें सड़क से संसद के भीतर तक भी उठती दिखीं। हिंसा में अबतक सुरक्षा अधिकारी अंकित शर्मा और पुलिसकर्मी रतनलाल सहित 53 लोगों की मौत हो चुकी है, तो 200 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे है। मामले में पुलिस ने 250 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की है और शाहरुख पठान सहित 900 से अधिक लोगों को या तो गिरफ्तार किया है या फिर हिरासत में लिया है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है कि आखिर दिल्ली में हिंसा क्यों भड़की? क्या इसे समय रहते रोका जा सकता था?





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