Punjab Kesari 2021-02-10

आंदोलनजीवियों का सच

दिल्ली सीमा पर कृषि-सुधार कानून विरोधी आंदोलन को ढाई माह से ऊपर हो गया है। यह कब समाप्त होगा- कहना कठिन है। किंतु इस आंदोलन में कुछ सच्चाइयां छिपी है, जिससे हमें वास्तविक स्थिति को समझने में सहायता मिलती है। पहला- यह किसान आंदोलन ही है। दूसरा- कृषि सुधारों के खिलाफ आंदोलित यह किसान देश के कुल 14.5 करोड़ किसानों में से मात्र 4-5 लाख का प्रतिनिधित्व करते है। तीसरा- यह संघर्ष नव-धनाढ्य किसानों के वित्तीय हितों और अस्तित्व की रक्षा को लेकर है। और चौथा- इस विरोध प्रदर्शन का लाभ हालिया चुनावों (2019 का लोकसभा चुनाव सहित) में पराजित विपक्षी दलों के समर्थन से जिहादी, खालिस्तानी, वामपंथी, वंशवादी और प्रतिबंधित एनजीओ और शहरी नक्सली जैसे प्रमाणित भारत विरोधी अपने-अपने एजेंडे की पूर्ति हेतु उठा रहे है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए व्यंग-विनोद में "आंदोलनजीवी" शब्दावली का उल्लेख किया था। वास्तव में, यह लोग अलग-अलग रूपों में भारत की मूल सनातन और बहुलतावादी भावना के खिलाफ दशकों से प्रपंच रच रहे है। चूंकि अपनी विभाजनकारी मानसिकता और भारत-विरोधी चरित्र के कारण यह समूह अपने बल पर भारत में कोई भी आंदोलन खड़ा करने में असमर्थ है, इसलिए वे दशकों से- विशेषकर वर्ष 2014 के बाद से देश में सत्ता-अधिष्ठान विरोधी प्रदर्शनों (वर्तमान किसान आंदोलन सहित) में शामिल होकर खंडित भारत को फिर से टुकड़ों में विभाजित करने का प्रयास कर रहे है। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में उपद्रव, लालकिले के प्राचीर में जबरन घुसकर पंथविशेष का ध्वज फहराना और खालिस्तान समर्थकों द्वारा विदेशों में प्रदर्शन के बाद एक विषाक्त "टूलकिट" का खुलासा होना, जिसमें योजनाबद्ध तरीके से किसान आंदोलन को लेकर भारत-विरोधी अभियान छेड़ने का उल्लेख है- इसका प्रमाण है।
Punjab Kesari 2021-02-03

2021-22 बजट: आर्थिकी के लिए संजीवनी

कठिन समय ही सही परीक्षा का समय होता है। वैश्विक महामारी कोविड-19 ने पिछले 10 माह में विश्व अर्थव्यवस्था को तबाह करके रख दिया है और भारत इसका अपवाद नहीं है। इस मुश्किल घड़ी में भारतीय आर्थिकी को पुनर्जीवित करना, उसे फिर से विकास का ईंजन बनाना और निराशाजनक स्थिति को आशावान वातावरण में परिवर्तित करना स्वाभाविक रूप से वांछनीय लक्ष्य है। संतोष इस बात का है कि वित्तवर्ष 2021-22 का बजट इन कसौटियों पर खरा उतरता है। यदि बजट का संपूर्ण क्रियान्वन हुआ, तो निसंदेह यह देश की आर्थिकी के लिए संजीवनी होगी। इस बजट की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें तथ्यों को ईमानदारी से पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया गया है। चालू वित्तवर्ष में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को खाद्य सब्सिडी के लिए 1,15,570 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। किंतु बजटीय प्रावधान से अलग एफसीआई पर तीन लाख करोड़ से अधिक का उधार भी हो गया। वित्तमंत्री ने इस आंकड़े को संशोधित करते हुए 4,22,618 करोड़ रुपये कर दिया। वित्त वर्ष 2020-21 के लिए यह संशोधित अनुमान, बजटीय आंकड़े से 3.66 गुना अधिक है। यह दर्शाता है कि एफसीआई की लगभग सभी उधारी को स्वीकृति दे दी गई है। अगले वित्तवर्ष में खाद्य सब्सिडी का बजटीय अनुमान 2,42,836 करोड़ रुपये रखा गया है। यही नहीं, सरकार का माना है कि चालू वित्तवर्ष के लिए पूंजीगत व्यय 4.12 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान से बढ़कर 4.39 लाख करोड़ रुपये हो गया है। अगले वित्तवर्ष में इसे 34.5 प्रतिशत बढ़ाकर 5.5 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है।
Punjab Kesari 2021-01-27

राम मंदिर पुनर्निर्माण- भारतीय सांस्कृतिक पहचान की पुनर्स्थापना

रामजन्मभूमि अयोध्या में बनने जा रहे मंदिर सहित 70 एकड़ परिसर की भव्यता पर 1,100 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह निर्माण कार्य 3 वर्ष में पूरा होने का अनुमान है। प्रस्तावित राम मंदिर के वैभव की झलक गणतंत्र दिवस पर दिल्ली स्थित राजपथ पर निकली महर्षि वाल्मीकि और राम मंदिर की प्रतिकृति से सुसज्जित उत्तरप्रदेश की झांकी में मिल जाती है। देश-विदेश में मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के हजारों मंदिर है। ऐसे में अयोध्या स्थित निर्माणाधीन मंदिर क्या एक अन्य राम मंदिर की भांति होगा- जिसकी विशेषता केवल उसकी सुदंरता, भव्यता और विशालता तक सीमित होगी या फिर इसका महत्व कहीं अधिक व्यापक है? करोड़ों हिंदुओं की आस्था है कि श्रीराम, भगवान विष्णु के एक अवतार है। क्या राम को केवल इस परिचय की परिधि से बांधा जा सकता है? वास्तव में, श्रीराम ही भारतीय सनातन संस्कृति की आत्मा है, जिनका जीवन इस भूखंड में बसे करोड़ों लोगों के प्रेरणास्रोत है। वे अनादिकालीन भारतीय जीवनमूल्य, परंपराओं और कर्तव्यबोध का शाश्वत प्रतीक हैं। इसलिए गांधीजी के मुख पर श्रीराम का नाम रहा, तो उन्होंने आदर्श भारतीय समाज को रामराज्य में देखा। यह विडंबना ही है कि स्वतंत्रता के बाद जीवन के अंतिम क्षणों में राम का नाम (हे राम) लेने वाले बापू की दिल्ली स्थित राजघाट समाधि तो बीसियों एकड़ में फैली है, किंतु 5 अगस्त 2020 से पहले स्वयं रामलला अपने जन्मस्थल पर अस्थायी तिरपाल और तंबू में विराजमान रहे। यही नहीं, 2007 में स्वघोषित गांधीवादियों ने अदालत में श्रीराम को काल्पनिक बता दिया। यह विडंबना ही है कि जहां देश का एक वर्ग (वामपंथी-जिहादी कुनबा सहित) भारतीय संस्कृति और उसके प्रतीकों से घृणा करता है, वही ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो ने भारत द्वारा भेजी स्वदेशी कोविड वैक्सीन पर "संजीवनी बूटी ले जाते भगवान हनुमान" की तस्वीर ट्वीट करते हुए धन्यवाद किया है। बोल्सोनारो का यह संकेत भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों की वैश्विक स्वीकार्यता को रेखांकित करता है।
Amar Ujala 2021-01-22

किसान आंदोलन- यथास्थितिवाद का पलटवार

शुक्रवार (22 जनवरी) को सरकार और किसान संगठनों के बीच 11वें दौर का संवाद होगा। क्या दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुंचेंगे? इससे पहले बुधवार (20 जनवरी) की बातचीत तो विफल हो गई, परंतु समझौते के बीज अंकुरित होते दिखाई दिए। जहां आंदोलनकारी किसान तीनों कृषि कानूनों को निरस्त करने की मांग पर अड़े है, वही सरकार किसी भी कीमत पर आंदोलनकारी किसानों पर बलप्रयोग करने से बच रही है। प्रारंभ में सरकार इन कानूनों के माध्यम से कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन लाने हेतु कटिबद्ध दिख रही थी। किंतु लोकतंत्र में दृढ़-निश्चयी अल्पसंख्यक वर्ग कैसे एक अच्छी पहल को अवरुद्ध कर सकता है- कृषि कानून संबंधित घटनाक्रम इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। सर्वप्रथम, यह नए कृषि कानून अकस्मात नहीं आए। पिछले दो दशकों से कृषि क्षेत्र की विकासहीनता और उसके शिकार किसानों द्वारा आत्महत्याओं से सभी राजनीतिक दल चिंतित है और उसमें सुधार को प्राथमिकता देते रहे है। इसी पृष्ठभूमि में सत्तारुढ़ भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में 2022-23 तक किसान आमदनी को दोगुना करने का वादा किया था। इसके लिए सरकार जहां सरकार 23 कृषि उत्पादों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिया, तो पीएम-किसान योजना के माध्यम से सात किस्तों में 1.26 लाख करोड़ रुपये भी 11.5 करोड़ किसानों के खातों में सीधा पहुंचाया। फिर भी हजारों किसान पिछले डेढ़ महीने से दिल्ली सीमा पर धरना दे रहे है। इस स्थिति कारण ढूंढने हेतु हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। भारत 1960 दशक में भूखमरी के कगार पर था। न ही हम अपनी जरुरत के अनुरूप अनाज पैदा कर पा रहे थे और न ही हमारे पास अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदने हेतु विदेशी मुद्रा थी। तब देश घटिया गुणवत्ता के अमेरिकी पीएल-480 गेहूं पर निर्भर था। इस विकट स्थिति को आम-बोलचाल की भाषा में Ship to Mouth कहा जाता था। फिर रसायनिक खादों के दौर, नए बीजों, किसानों के अथक परिश्रम और सरकारी नीतियों से भारतीय कृषि की सूरत बदल गई। उसी कालखंड में गेहूं-धान पर भी पहली बार एमएसपी लागू हुआ था।
Amar Ujala 2021-01-10

अमेरिका में दोहरे मापदंडों की मार

अमेरिका में 6 जनवरी को जो कुछ हुआ, उससे शेष विश्व स्वाभाविक रूप से भौचक है। परंतु क्या यह सत्य नहीं है कि अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में हिंसा का अतिक्रमण पहले ही हो चुका था? जब तक ट्रंप विरोधी भीड़ हिंसक थी, तब तक उनका प्रदर्शन- जनाक्रोश और देशभक्ति था। 25 मई 2020 को एक श्वेत पुलिसकर्मी द्वारा अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की गर्दन दबाकर निर्मम हत्या के बाद भड़की हिंसा ने अमेरिका के 2,000 कस्बों-शहरों को अपनी कब्जे में ले लिया था। भीषण लूटपाट के साथ करोड़ों-अरबों की निजी-सार्वजनिक संपत्ति को फूंक दिया गया था। हिंसा में 19 लोग मारे गए थे, जबकि 14 हजार लोगों की गिरफ्तारियां हुई थी। इस हिंसा का नेतृत्व वामपंथी अश्वेत संगठन- एंटिफा (Antifa) कर रहा था। तब कई वाम-वैचारिक अमेरिकी राजनीतिज्ञों और पत्रकारों ने इस अराजकता को न केवल उचित ठहराया, अपितु इसे प्रोत्साहन भी दिया। एंटिफा प्रायोजित उत्पात पर सीएनएन के प्रख्यात टीवी एंकर क्रिस कूमो ने कहा था, "किसने कहा है कि प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण रहना चाहिए?" वही भारतीय मूल की अमेरिकी सांसद और कश्मीर मामले में पाकिस्तान हितैषी प्रमिला जयपाल ने एक ट्वीट में अश्वेतों के हिंसक प्रदर्शन को देशभक्ति की संज्ञा दी थी। इसी तरह एक अन्य अमेरिकी सांसद अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज़ ने तो ट्वीट करते हुए यहां तक लिख दिया था, "प्रदर्शनकारियों का लक्ष्य ही होना चाहिए कि अन्य लोगों असुविधा हो।" सबसे बढ़कर अमेरिका की भावी उप-राष्ट्रपति और भारतीय मूल की कमला हैरिस ने एंटिफा प्रोत्साहित हिंसा का समर्थन करते हुए कहा था, "अब यह रुकने वाला नहीं है।"
Punjab Kesari 2021-01-06

हम में से कुछ को अपनी पहचान से घृणा क्यों?

गत बुधवार (30 दिसंबर) को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में बहुसंख्यक मुसलमानों की भीड़ ने अल्पसंख्यक हिंदुओं के एक प्राचीन मंदिर को ध्वस्त करके जला दिया। इस प्रकार के जमींदोज का यह भारतीय उपमहाद्वीप में कोई पहला मामला नहीं था और यह आखिरी बार था- ऐसा भी कहा नहीं जा सकता। विश्व के इस भूखंड में देवालय विध्वंस की परंपरा सन् 712 में मो.बिन कासिम के सिंध पर आक्रमण के साथ शुरू हुई थी- जो गजनी, गौरी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब और टीपू सुल्तान जैसे क्रूर इस्लामी आक्रांताओं के कालखंड से आजतक अविरत जारी है। जब पाकिस्तान के खैबर में जिहादियों द्वारा प्राचीन हिंदू मंदिर को तोड़ा जा रहा था, तब लगभग उसी समय में भारत के आंध्रप्रदेश में कई हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां को खंडित कर दिया गया। पहले विजयनगर में भगवान राम की 400 वर्ष पुरानी मूर्ति क्षत-विक्षत किया गया, फिर राजमुंद्री में भगवान सुब्रमण्येश्वर स्वामी और विजयवाड़ा में देवी सीता की प्रतिमाएं क्षतिग्रस्त मिली। अब खैबर पख्तूनख्वा और आंध्रप्रदेश की घटनाओं में अंतर केवल इतना था कि पाकिस्तान में यह सब घोषणा करके खुलेआम हुआ, तो यहां चोरी-छिपे या रात के अंधेरे में किया गया। यह अकाट्य है कि इन दोनों घटनाओं को मूर्त रूप में देने वाली मानसिकता एक ही है। यदि 1947 के बाद पाकिस्तान का हिंदू, बौद्ध, जैन मंदिरों और प्रतिमाओं के विध्वंस का रिकॉर्ड है, तो खंडित भारत में "काफिर-कुफ्र" दर्शन से प्रेरित मजहबी हिंसा का लंबा इतिहास है। वर्ष 1989-91 के बीच जब कश्मीर जिहादी तूफान की चपेट में था, जिसमें दर्जनों हिंदुओं की हत्या और उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार के बाद पांच लाख कश्मीर पंडित पलायन हेतु विवश हुए थे- तब उसी विषाक्त वातावरण में कई ऐतिहासिक मंदिरों को या तो बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया था या फिर पूर्ण रूप से खंडित। 2012 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कश्मीर के 208 मंदिर जिहाद का शिकार हुए थे।
Dainik Jagran 2021-01-04

आखिर इस्लाम के कट्टर स्वरूप से विश्व कैसे निपटे?

फ्रांस पुन: सुर्खियों में है। इस बार कारण उसका वह प्रस्तावित अलगाववाद विरोधी विधेयक है, जो आगामी दिनों में कानून का रूप लेगा। इस विधेयक का प्रत्यक्ष-परोक्ष उद्देश्य इस्लामी कट्टरता से अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को सुरक्षित रखना है। फ्रांस का मानना है कि जिहादियों ने मजहब के नाम पर जैसी हिंसा की है- उससे फ्रांसीसी एकता, अखंडता और उसके सदियों पुराने जीवनमूल्यों पर गंभीर खतरा हो गया है। फ्रांस के इन निर्णयों से तिलमिलाए कई इस्लामी देशों ने "फ्रांसीसी वस्तुओं के बहिष्कार" संबंधी आंदोलन को तेज कर दिया है। प्रस्तावित कानून के माध्यम से मस्जिदों को केवल पूजास्थल के रूप में पंजीकृत किया जाएगा। इस समय फ्रांस में 2,600 छोटी-बड़ी मस्जिदें है, इनमें से अधिकांश में मदरसों का संचालन होता है। ऐसा माना जाता है कि बहुत से मदरसे ही फसाद की असल जड़ है, जहां नौनिहालों में बचपन से ही विषाक्त अलगाववादी बीज बो दिए जाते है। इमामों को सरकारी देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाएगा। किसी भी न्यायाधीश को आतंकवाद, घृणा या हिंसा के दोषी को मस्जिद जाने से रोकने का भी अधिकार होगा। बहुपत्नी विवाह (लव-जिहाद सहित) को भी काबू किया जाएगा। पेरिस-नीस आतंकवादी घटना के बाद से फ्रांस 75 प्रतिबंध लगा जा चुका हैं, तो 76 मस्जिदों के खिलाफ अलगाववाद भड़काने की जांच कर रहा है।