Dainik Jagran 2021-01-04

आखिर इस्लाम के कट्टर स्वरूप से विश्व कैसे निपटे?

फ्रांस पुन: सुर्खियों में है। इस बार कारण उसका वह प्रस्तावित अलगाववाद विरोधी विधेयक है, जो आगामी दिनों में कानून का रूप लेगा। इस विधेयक का प्रत्यक्ष-परोक्ष उद्देश्य इस्लामी कट्टरता से अपने सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को सुरक्षित रखना है। फ्रांस का मानना है कि जिहादियों ने मजहब के नाम पर जैसी हिंसा की है- उससे फ्रांसीसी एकता, अखंडता और उसके सदियों पुराने जीवनमूल्यों पर गंभीर खतरा हो गया है। फ्रांस के इन निर्णयों से तिलमिलाए कई इस्लामी देशों ने "फ्रांसीसी वस्तुओं के बहिष्कार" संबंधी आंदोलन को तेज कर दिया है। प्रस्तावित कानून के माध्यम से मस्जिदों को केवल पूजास्थल के रूप में पंजीकृत किया जाएगा। इस समय फ्रांस में 2,600 छोटी-बड़ी मस्जिदें है, इनमें से अधिकांश में मदरसों का संचालन होता है। ऐसा माना जाता है कि बहुत से मदरसे ही फसाद की असल जड़ है, जहां नौनिहालों में बचपन से ही विषाक्त अलगाववादी बीज बो दिए जाते है। इमामों को सरकारी देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाएगा। किसी भी न्यायाधीश को आतंकवाद, घृणा या हिंसा के दोषी को मस्जिद जाने से रोकने का भी अधिकार होगा। बहुपत्नी विवाह (लव-जिहाद सहित) को भी काबू किया जाएगा। पेरिस-नीस आतंकवादी घटना के बाद से फ्रांस 75 प्रतिबंध लगा जा चुका हैं, तो 76 मस्जिदों के खिलाफ अलगाववाद भड़काने की जांच कर रहा है।
Amar Ujala 2020-11-26

"लव-जिहाद" की सच्चाई

क्या "लव-जिहाद" वास्तविकता है या मिथक? यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है, क्योंकि गत 24 नवंबर को उत्तरप्रदेश सरकार ने गैरकानूनी मतांतरण संबंधी अध्यादेश पारित कर दिया। मध्यप्रदेश, हरियाणा, असम और कर्नाटक की सरकारों ने भी ऐसा ही कानून लाने निर्णय किया है। प्रस्तावित प्रारूप के अनुसार, बहला-फुसलाकर, प्रलोभन, लालच, बलपूर्वक, झूठ बोलकर हुए मतांतरण को अपराध माना जाएगा और ऐसा करने वाले को 1-10 वर्ष कारावास हो सकती है। यह सभी लोगों पर समान रूप से लागू होगा। जैसे ही इसपर सार्वजनिक विमर्श शुरू हुआ, वैसे ही स्वघोषित सेकुलरिस्टों और वामपंथियों के कुनबे ने इसे सांप्रदायिक और प्रतिगामी बताकर सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा कर दिया। इसी बीच विवाह हेतु मतांतरण पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो निर्णय सामने आए। एक मामले में मुस्लिम युवती समरीन हिंदू से शादी पश्चात प्रियांशी बन गई, जिसे अदालत ने अवैध माना और कहा, "केवल विवाह के लिए मतांतरण वैध नहीं"। वही दूसरे घटनाक्रम में हिंदू युवती प्रियंका, सलामत अंसारी से निकाह पश्चात मुस्लिम बन गई, जिसे उसी न्यायालय ने "पसंद का जीवनसाथी चुनने का अधिकार" बता दिया।
Dainik Jagran 2020-11-12

चीन पर चुप्पी, फ्रांस का विरोध क्यों?

पेरिस-नीस की आतंकवादी घटनाओं पर फ्रांसीसी प्रतिक्रिया के खिलाफ तमाम इस्लामी राष्ट्र और भारतीय उपमहाद्वीप के लाखों मुसलमान गोलबंद है। कराची स्थित इस्लामी उपद्रवियों ने जहां फ्रांस विरोधी प्रदर्शन में हिंदू मंदिर तोड़कर उसमें रखी मूर्तियों को नष्ट कर दिया, तो उन्मादी भीड़ ने ढाका स्थित कोमिला में दर्जनों अल्पसंख्यक हिंदुओं के घरों को आग लगा दी। अब घटना हुई फ्रांस में, किंतु हिंदुओं पर गुस्सा क्यों फूटा? शायद इसलिए, क्योंकि ईसाइयों की भांति हिंदू भी जिहादियों की नज़र में "काफिर" है। भारत में- भोपाल, मुंबई, हैदराबाद आदि नगरों में, जहां हजारों मुसलमानों ने उत्तेजित नारों के साथ प्रदर्शन किया, तो कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों (मुनव्वर राणा सहित) ने फ्रांस की आतंकवादी घटनाओं को उचित ठहराते नजर आए। मुसलमान आखिर किस बात से आक्रोशित है? उत्तेजित प्रदर्शनकारियों की नाराज़गी का कारण पैगंबर मोहम्मद साहब के कार्टून से जनित हिंसक घटनाक्रम में फ्रांस का "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" की रक्षा में डटे रहना है। वह इसे पैगंबर साहब का अपमान और इस्लाम पर हमला मान रहे है। क्या वाकई फ्रांस ने ऐसा कुछ किया है?
Sahara 2020-11-07

इस्लामोफोबिया का सच

हाल के वर्षों में अंग्रेजी शब्दकोश में एक नया शब्द "इस्लामोफोबिया" जुड़ गया है। "सेकुलरवाद" और "उदारवाद" के नाम पर विश्वभर (भारत सहित) के तथाकथित बुद्धिजीवी और अधिकांश मुस्लिम-विचारक इस संज्ञा का उपयोग धड़ल्ले से कर रहे है। इसके माध्यम से वह लोग यह संदेश देने का प्रयास कर रहे है कि इस्लाम के नाम पर लोगों को अकारण भयभीत, मुस्लिमों को प्रताड़ित और मुसलमानों को घृणा का पात्र बनाया जा रहा है। फ्रांस में पैगंबर साहब के कार्टून संबंधित हिंसक घटनाक्रम के संदर्भ में "इस्लामोफोबिया" फिर से सुर्खियों में है। फ्रांस की कुल आबादी 6.5 करोड़ में 8-9 प्रतिशत मुसलमान अर्थात् 55-60 लाख के बीच है। अधिकांश मुसलमान आप्रवासी मूल के है, जिनका संबंध गृहयुद्ध से जूझते या युद्धग्रस्त मध्यपूर्वी इस्लामी देशों से है। प्रश्न उठता है कि फ्रांस जैसे गैर-इस्लामी देश में इन लोगों ने शरण क्यों ली?- वह भी तब, जब विश्व में 56 मुस्लिम बहुल या इस्लामी गणराज्य है- जहां शरीयत का वर्चस्व है। शरण देने वाले अधिकांश यूरोपीय देशों में समस्या तब शुरू हुई, जब इन शरणार्थियों ने वहां की "उदारवादी" जीवनशैली पर जबरन इस्लाम को थोपना चाहा। फ्रांस की हालिया आतंकी घटना- इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहां पैगंबर साहब का कार्टून दिखाने पर चार लोगों की हत्या कर दी गई। इस यूरोपीय देश ने "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" पर किसी भी प्रकार का समझौता करने से इनकार कर दिया है। क्या इसे "इस्लामोफोबिया" कहना उचित होगा? क्या फ्रांस के लोगों को अपनी जीवनमूल्यों के अनुरूप जीने का अधिकार नहीं है?
Punjab Kesari 2020-11-04

बदलेंगे जम्मू-कश्मीर के हालात

पेरिस और कश्मीर- बीते दिनों आतंकी घटनाओं के साक्षी बने। जहां विगत दो सप्ताह के भीतर पेरिस में इस्लाम के नाम पर जिहादियों ने चार निरपराधों की हत्या कर दी, तो वही कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी के तीन नेताओं को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया। पेरिस में मरने वाले गैर-मुस्लिम, तो मारने वाले स्वघोषित सच्चे मुसलमान थे। वही घाटी में मरने और मारने वाले दोनों मुसलमान थे। यक्ष प्रश्न उठता है कि मुस्लिमों ने तीन मुस्लिम नेताओं की हत्या क्यों की? यह तीनों घाटी में भाजपा के माध्यम से बहुलतावादी सनातन भारत और उसकी लोकतांत्रिक व्यवस्था से जुड़े थे। संभवत: हत्यारों को इस जुड़ाव में इस्लाम के लिए खतरा नजर आया। कश्मीर में यह हत्याएं तब हुई, जब कालांतर में वर्तमान मोदी सरकार ने इस्लामी आतंकवाद-कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई में फ्रांस का खुलकर समर्थन करने की घोषणा की थी। बात केवल कश्मीर तक सीमित नहीं। जैसे ही भारत ने पेरिस में आतंकी घटनाओं के पश्चात फ्रांसीसी सरकार की कार्रवाई को न्यायोचित ठहराया, वैसे ही फ्रांस विरोधी वैश्विक मजहबी प्रदर्शन में भारतीय मुसलमान का बड़ा वर्ग भी शामिल हो गया। भोपाल में प्रशासनिक अनुमति के बिना कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद के नेतृत्व में हजारों मुस्लिमों ने इक़बाल मैदान में प्रदर्शन किया, तो मुंबई स्थित नागपाड़ा और भिंडी बाजार क्षेत्र के व्यस्त सड़क-मार्ग पर विरोधस्वरूप फ्रांसीसी राष्ट्रपति का पोस्टर चिपका दिया। तेलंगाना में भी कांग्रेस प्रदेश अल्पसंख्यक ईकाई ने फ्रांस विरोधी प्रदर्शन किया और राज्य सरकार से फ्रांसीसी उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर दी।
Punjab Kesari 2020-10-28

लव-जिहाद (TAQIYA) को बढ़ावा देने का विरोध तो होगा

आभूषण निर्माता तनिष्क के विज्ञापन से जनित विवाद विमर्श में है। अंतर-मजहबी विवाह में गोद-भराई, जिसमें लड़की हिंदू और लड़के का परिवार मुस्लिम दिखाया गया था- उसका चित्रण करते हुए विज्ञापन को "एकात्वम" की संज्ञा दी गई। जैसे ही यह विज्ञापन प्रसारित हुआ, कई राष्ट्रवादी संगठनों ने इसे "लव-जिहाद" को बढ़ावा देने वाला बताते हुए विरोध करना प्रारंभ दिया। इसके बाद तनिष्क ने जनभावनाओं को आहत करने के लिए माफी मांगी और अपने विवादित विज्ञापन को वापस ले लिया। जैसे शाहबानो, सैटेनिक वर्सेस, लज्जा प्रकरण के बाद एक समुदाय विशेष की भावनाओं और मान्यताओं का सेकुलरवाद के नाम पर सम्मान किया गया था, वैसे ही तनिष्क घटनाक्रम में भी होना चाहिए था। किंतु ऐसा नहीं हुआ। कारण स्वघोषित सेकुलरिस्ट, स्वयंभू उदारवादी और वामपंथी द्वारा स्थापित उस विकृत नैरेटिव में छिपा है- जिसमें मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर एकजुट करने, तो हिंदुओं को जातियों के आधार पर बांटने का एजेंडा है।
Punjab Kesari 2020-10-21

क्या पेरिस की बर्बर घटना में छिपा है इस्लाम का सच?

विगत कुछ दिनों से "इस्लाम का संकट" वैश्विक विमर्श में है। इस चर्चा को 16 अक्टूबर (शुक्रवार) की उस घटना के बाद तब और गति मिल गई, जब फ्रांस की राजधानी पेरिस में 18 वर्षीय मुस्लिम ने 47 वर्षीय शिक्षक की गर्दन काटकर हत्या कर दी। फ्रांसीसी सरकार ने इसे इस्लामी आतंकवाद की संज्ञा दी है। मृतक सैम्युएल पैटी इतिहास विषय का शिक्षक था और हत्यारा मॉस्को में जन्मा चेचेन्या का मुस्लिम शरणार्थी। पैटी का दोष केवल इतना था कि उसने अपनी कक्षा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में पढ़ाते हुए पैगंबर मोहम्मद साहब का एक कार्टून दिखाया था। जिहादियों द्वारा फतवा जारी होने के कुछ समय पश्चात उसी शाम स्कूल के निकट हथियारों से लैस इस्लामी आतंकी पहुंचा और उसने "अल्लाह-हू-अकबर" का नारा लगाते हुए धारदार चाकू से घर लौट रहे सैम्युएल का गला निर्ममता से काट दिया। जवाबी कार्रवाई में आतंकी पुलिस के हाथों मारा गया। पुलिस ने आरोपी की पूरी पहचान उजागर नहीं की है। उसका मानना है कि हमलावर की बेटी उसी स्कूल में पढ़ती थी। इस मामले के बाद फ्रांस में इस्लाटमिक कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है, दर्जनों स्थानों पर जांच एजेंसियों ने छापेमारी की है।
Punjab Kesari 2020-01-24

लव-जिहाद सच है या झूठ?

गत दिनों कैथोलिक बिशप की सर्वोच्च संस्था "द सायनॉड ऑफ साइरो-मालाबार चर्च" ने केरल में योजनाबद्ध तरीके से ईसाई युवतियों के मतांतरण का मुद्दा उठाया। लगभग उसी कालांतर में पाकिस्तान स्थित सिंध में तीन और नाबालिग हिंदू लड़कियों के अपहरण, जिसमें एक का मतांतरण के बाद जबरन निकाह कर दिया गया। धरातल पर कहने को दोनों मामले भारतीय उपमहाद्वीप के दो अलग हिस्सों से सामने आए है, किंतु इनका आपस में बहुत ही गहरा संबंध है। इन दोनों घटनाओं के पीछे एक ही विषाक्त दर्शन है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 19 जनवरी (रविवार) को केरल स्थित साइरो-मालाबार चर्च के सामूहिक प्रार्थना के दौरान एक परिपत्र को पढ़ा गया। इसमें केरल सहित अन्य राज्यों की ईसाई युवतियों को प्रेमजाल में फंसाने और इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकवादी संगठनों में भेजे जाने के खिलाफ चेतावनी थी। इससे कुछ दिन पहले ही "द सायनॉड ऑफ साइरो-मालाबार चर्च" के कार्डिनल जॉर्ज एलनचेरी की अध्यक्षता में हुई बैठक में भी राज्य पुलिस पर "लव-जिहाद" के मामलों पर ठोस कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया था। जैसे ही लव-जिहाद का मामला पुन: विमर्श में आया, एकाएक केरल की वामपंथी सरकार ने आरोपों का खंडन कर दिया।





123456789101112131415161718192021222324252627282930313233343536373839404142434445464748495051525354555657585960616263Next